बबन रावतभारत वर्ण एवं जाति व्यवस्था पर आधारित एक विशाल एवं प्राचीन देश है. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चार वर्णों के अंतर्गत तकरीबन साढ़े छह हजार जातियां हैं, जो आपस में सपाट नहीं बल्कि सीढ़ीनुमा है. यहां ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ एवं भंगी को सबसे अधम एवं नीच समझा जाता है.
मनु महाराज अपने ग्रंथ मनु स्मृति में अध्याय 10 के श्लोक 51 से 56 तक में लिखते हैं कि चांडालों एवं स्वपचों के आवास गांव से बाहर होंगे. उन्हें अपात्र बना देना चाहिए. वे चिह्रित प्रतीकों के जरिये पहचाने जायें, दूसरे लोग उनके संपर्क में न आयें. चांडालों का पात्र टूटा हुआ बरतन होगा, भोजन जूठा व बासी होगा, जो दूसरों द्वारा दिया हुआ होगा. इनका कार्य होगा लावारिस लाशों को दफनाना. संपत्ति होंगे कुत्ते व गधे और वस्त्र होगा मुरदों का उतरन.
पराशर स्मृति (अध्याय- छह, श्लोक - 24) तथा व्यास स्मृति (अध्याय-1 /11, श्लोक - 12) में चांडालों के बारे में लिखा गया है कि अगर कोई व्यक्ति चांडाल, स्वपच को भूल से भी देख ले तो उसी समय सूर्य की ओर देख ले और स्नान क रे, तभी वह शुद्ध हो सक ता है.
इतिहासकार झा और श्रीमाली अपनी पुस्तक प्राचीन भारत का इतिहास (पृष्ठ संख्या-310) में लिखते हैं कि जिस प्रकार फाहियान ने पांचवी शताब्दी में अछूतों का वर्णन कि या है, उसी प्रकार ह्वेनसांग ने भी अस्पृश्यता का उल्लेख किया है. वह लिखता है कि कसाई और मेहतर नगर के बाहर ऐसे मकानों में निवास क रते थे, जो विशेष चिह्र से जाने जा सकते थे. साधारणत: चांडालों की श्रेणी से मेहतर और डोम नाम की जाति प्रकट हुई, जिनका पेशा सड़कों और गलियों को साफ करना, विष्ठा(मल)उठाना, श्मशान में शवों को दफन करना, अपराधियों को फांसी पर लटकाना और रात में चोरों को पक ड़ना था.
यदि जैन स्रोतों पर विश्वास कि या जाये तो आज के भंगी समाज के लोग ब्राह्मणवाद के शिकार हुए हैं. भंगी का अर्थ होता है भंग कि या हुआ अर्थात समाज से टूटे तथा बिछड़े हुए लोग अथवा दंड देक र या बहिष्कृत कर निकाले हुए लोग. एक दूसरे मत के अनुसार गुप्त काल में भूमि हस्तानांतरण अथवा भूमि राजस्व की प्रथा से कायस्थों के रूप में एक नयी जाति का जन्म हुआ, जिन्होंने ब्राह्मणों के लेखन संबंध एकाधिकार को चुनौती देते हुए उनके वर्चस्व को समाप्त क र दिया. यही कारण है कि परवर्ती ब्राह्मण साहित्य में कायस्थों की बड़ी भर्त्सना की गयी है, उन्हें शूद्र तक कहा गया है.
ठीक उसी समय (गुप्त काल) उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गांव के सरदारों और मुखिया की एक श्रेणी उभर कर आयी जो महत्तर कहलाते थे. उन्हें जमीन की अदला-बदली की सूचना दी जाती थी, जो बाद में एक जाति के रू प में परिणत हो गये. संभवत: आज के मेहतर ही गुप्त काल में महत्तर कहलाता हो. और गुप्तकालीन महत्तर का अपभ्रंश होकर आज मेहतर हो गया हो, जिसका आधिपत्य मुखिया और सरदार के रू प में उत्तर भारत के गांवों में रहा होगा. मेहतर समाज के सामाजिक ढांचे में भी पुराने समय से मुखिया और सरदारी प्रथा कायम है जो गुप्त कालीन महत्तर समाज से मेल खाता है. हो सक ता है कायस्थों की तरह गुप्त काल में मेहतरों ने भी ब्राह्मणों को चुनौती दी हो और कुपित ब्राह्मणों ने उन्हें भी नीच, पतित और चांडाल घोषित कर समाज से बहिष्कृत कर इनसे शिक्षा और शासन का अधिकार छीन लिया हो. इस तरह मुख्यधारा से कटे तथा समाज से भंग किये हुए लोग कालांतर में भंगी कहलाये हों और सजा के तौर पर मानव के मल को ढोने को मजबूर कर दिये गये हों.
एक दूसरे मत के अनुसार, आर्यों के आक्रमण के समय ऐसा प्रतीत होता है कि आज के भंगी समाज के लोगों ने अन्य मूल निवासियों की तरह साथ मिल कर दुश्मनों के खिलाफ काफी विस्तारपूर्वक संघर्ष किया होगा, जिसे आर्य-अनार्य या देव-असुर संग्राम के नाम से भी जाना जाता है. लेकि न आर्यों की युद्ध विद्या, घुड़सवार शैली एवं छल-प्रपंच के आगे अनार्यों की हार हुई, जैसाकि हमेशा होता है. युद्ध में जो लोग जितनी वीरता से लड़ते हुए दुश्मनों द्वारा पराजित होक र उनकी गिरफ्त में आते हैं, उन्हें उतनी बड़ी सजा भी दी जाती है. हो सक ता है कि लड़ाकू भंगी समाज के लोग आर्यों की गिरफ्त में आने के बाद दास बना लिये गये हों और इनको क ठोर सजा के तौर पर इनसे मानव मल और गंदगी को साफ क रने जैसा घृणित कार्य को जबरन कराया गया हो. जबकि यह सर्वविदित है कि आर्यों के आने के पहले मानव मल ढोने की प्रथा भारत में कहीं नहीं थी.
विश्व की सर्वाधिक पुरानी सभ्यता, सिंधु घाटी के हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की खुदाई से भी यह स्पष्ट हो गया है कि उस समय मानव मल ढोने की प्रथा नहीं थी, बल्कि आज की तरह आधुनिक सीवर प्रणाली के शौचालयों का प्रमाण मिलता है. इससे पता चलता है कि मानव से मल ढुलवाने की प्रथा शुरू की नहीं है, बल्कि बाद की है.
11 लोगो ने कुछ कहा है. आप कुछ नहीं कहियेगा?:
जाति का इतिहास रोचक है.
जो हुआ, सो हुआ. मैला ढोना तो अनुचित है. सभ्यता का विकास प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था - तकनीकी विकास का सहारा लेकर ही सम्भव है.है.
अच्छा विषय चुना आपने लेखन के लिए।
अभी दो दिन पहले ही समाचार पत्रों में पढ़ा कि सिर पर मैला ढोने की परंपरा हमारे कुछ राज्यों में अभी भी जारी है।
21 वीं सदी में भी हम कितने आधुनिक हैं ना
हर माँ-बाप को अपने बच्चों के टट्टी-मूत तो उठाना ही पड़ता है। तो क्या वे भंगी कहलाएँगे?
तथाकथित शूद्र तो समाज के शोषक प्रभु वर्ग द्वारा सदियों से अकारण दंडित जातियाँ ही हैं।
जाति-प्रथा और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक कुप्रथाओं का उन्मूलन टेक्नोलॉजी के प्रयोग और शैक्षणिक-आर्थिक उन्नति के माध्यम से ही किया जा सकता है। सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक आंदोलनों के बूते की बात यह नहीं रह गई है।
मुल्क राज आनंद के प्रसिद्ध उपन्यास The Untouchables में इस तथ्य को बहुत खूबसूरती से दर्शाया गया है। इस उपन्यास में अछूत प्रथा को समाप्त करने के संबंध में की गई बहस अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसमें कहा गया है कि फ्लस सिस्टम वाले टायलेट के प्रयोग को बढ़ावा देकर सिर पर मैला ढोने की प्रथा को सहजता से खत्म किया जा सकता है, उसके लिए गांधीजी द्वारा की जा रही हरिजन-उद्धार की उदारवादी कोशिशों के बचकानेपन की जरूरत नहीं है। इस उपन्यास की पांडुलिपि खुद गांधीजी ने पढ़ी थी और संशोधनों के साथ उसे अनुमोदित भी किया था।
राहुल सांकृत्यायन की वोल्गा से गंगा नामक चर्चित किताब भी भारतीय समाज में जाति प्रथा के पदानुक्रम में ढलने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को कथात्मक अंदाज में प्रस्तुत करती है।
बढ़िया लेख है। आपकी अन्य सारी बातें मानीं, लेकिन यह आर्य-अनार्य युद्ध की आपकी व्याख्या प्रथमदृष्ट्या पूरी तरह अतार्किक प्रतीत होती है। इस बारे में कुछ तर्क दें तो बेहतर रहेगा।
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी
जो हुआ सो तो बुरा ही हुआ, मगर अब भी जो हो रहा है उससे कैसे बचा जा सकता है? आप कुछ सुझाएं हमें. धुरविरोधी जी भविष्य के बारे में पूछ रहे हैं. आप ही शुरू करें कि 'आने वाला कल एसा न हो, इसमें सब बराबर हों.'
क्या उम्मीद करें?
हरिराम जी
किसी बलात्कार की शिकार लड़की के साथ बलात्कार के दौरान भी तो वही सब होता है न जो एक पत्नी के साथ होता है पति के ज़रिये. तो हमें बलात्कार का विरोध क्यों करना चाहिए. भंगियों की स्थिति से आप अनभिग्य हैं और शायद इससे भी कि आदमी को जीने के लिए कितनी गरिमा की ज़रूरत होती है.
प्रतीक भाई
बबन जी को कह दिया है. वे जल्दी ही अपनी दलीलों के साथ हाज़िर होंगे.
भैया अगिनखोर, यहाँ सृजनशिल्पीजी ने बहुत सही कहा है। शायद आंदोलन के बजाय अन्य कारक बेहतर काम करें।
आप किसी गाँव और शहर की जातिगत स्थिति को देखें तो जमीन आसमान का अंतर है। मैं जहाँ काम करता हूँ वहाँ सैकड़ों लोग काम करते हैं। जब हम लंच के लिए जाते हैं तो सब एक साथ बैठते हैं कोई किसी की जाति नहीं पूछता, यहाँ तक कि यह बात भी किसी के मन में नहीं उठती। यह एक महानगर की स्थिति है। यहाँ इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता।
आप आज से पचास या फिर पच्चीस साल पहले की आज की स्थिति की तुलना करें तो यह सिर पर मैला ढोने की प्रथा बहुत हद तक कम हो गई है। हो सकता कमोबेश बहुस सी जगह पर चल भी रही हो। परंतु समय बीतने यह भी नहीं रहेगी।
Khoob kahi bhai,
zara woh log bhi padhe jo zamindari chod kar chaukidari kar rahe hain...maila dhone ki pratha aaj bhi jari hai isse badi sharm ki baat aur kya ho sakti hai...Mahatama Gandhi ne bhi apna maila khud dhone ki shuaat ki thi..
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